प्राचीन बुद्ध की मूर्ति के अंदर मिला ममीकृत भिक्षु


एक बैठे हुए बुद्ध की मूर्ति जिसने चीन के एक मंदिर से नीदरलैंड के एक बाजार तक रास्ता तय किया, बाद में इसके एक असाधारण रहस्य का पता चला की वह एक मूर्ति नहीं बल्कि - 1,000 साल पुराना ममीकृत भिक्षु है ।

कमल की स्थिति में बैठी मूर्ति के अंदर ममी पूरी तरह से फिट बैठती है। संग्रहालय ने एक विज्ञप्ति में कहा, "बाहर की तरफ, यह बुद्ध की एक बड़ी प्रतिमा जैसी दिखती है लेकिन स्कैन करने पर अनुसंधान से पता चला है कि अंदर  एक बौद्ध भिक्षु की ममी है जो वर्ष 1100 के आसपास की होगी।"

एक निजी खरीदार इसे बहाली के लिए एक विशेषज्ञ के पास लाया तब कहीं इस ममी को खोजा गया, अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि चीन से इस मूर्ति को कब और कैसे हटाया गया होगा। शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों की एक टीम ने जब मूर्ति का सी.टी स्कैन किया - तब उन्होंने यह भी पाया की ममी के बॉडी ऑर्गन्स गायब थे।

 " सी.टी स्कैन में जो हमें कुछ कुछ फेफड़े का ऊतक लग रहा था, लेकिन इसके बजाय वह चीनी पात्रों के साथ कवर किए गए कागज के छोटे टुकड़े निकले ," ड्रेंट म्यूजियम के एक पुरातत्व क्यूरेटर विंसेंट वैन विलस्टरन ने कहा।

ममी को चीनी शिलालेखों में लिपटे कपड़े के एक बंडल पर बैठा पाया गया था, जिससे ममी की पहचान हुई। यह ममी लिउक्वान नामक बौद्ध भिक्षु की थी , जिन्होंने मृत्यु के बाद जीवन की तैयारी  के लिए "स्व-ममीकरण" का अभ्यास किया होगा।  लिउक्वान नाम का अर्थ है "Six Perfections".

स्व-ममीकरण की प्रक्रिया जापान, चीन और थाईलैंड जैसे देशों में एक प्रसिद्ध परंपरा है, और एक हजार साल पहले इसका अभ्यास किया गया था। इस कठिन प्रक्रिया में एक विशेष आहार का खाना और एक जहरीली चाय  पी जाती थी जो जापानी वार्निश के पेड़ की छाल से बनती थी। इस चाय के कारण उलटी होती ओर साथ ही साथ सभी शारीरिक तरल पदार्थ तेज़ी से घटते  चले जाते थे ताकि शरीर इतना टॉक्सिक या विषाक्त हो जाए जिससे बैक्टीरिया और कीड़े शरीर को खाकर बर्बाद ना कर सकें। फिर एक जीवित कंकाल भिक्षु को बमुश्किल से एक पत्थर की कब्र में रखा जाता था , जो एक वायु नली और एक घंटी से लैस होती थी। कभी भी कमल की स्थिति से आगे बढ़ते हुए, भिक्षु हर दिन घंटी बजाता था ताकि बाहर के लोग जान सकें कि वह अभी भी जीवित है। जब घंटी बजनी बंद हो जाती थी, तो भिक्षु को मृत मान लिया जाता था , और हवा की नली को हटाकर कब्र को सील कर दिया जाता था। 1,000 दिनों के बाद कब्र को यह जांचने के लिए फिर से खोला जाता था कि क्या भिक्षु सफलतापूर्वक ममीकृत हो गयी है या नहीं। इस भयावह प्रक्रिया की कोशिश करने वाले सैकड़ों भिक्षुओं में से, केवल कुछ दर्जन ही बुद्ध के रूप में मंदिरों में स्व-प्रतिरक्षित और प्रतिष्ठित हुए थे।

वैन विलेस्टरन का कहना है की "हमें संदेह है कि पहले 200 वर्षों के लिए, इस ममी की चीन के एक बौद्ध मंदिर में पूजा की जाती होगी  ... केवल 14 वीं शताब्दी में ही इस ममी को एक अच्छी मूर्ति में बदलने के लिए इस पर काम किया गया होगा," ।

शोधकर्ता अभी भी ममी का पता लगाने की उम्मीद में डीएनए विश्लेषण के नतीजों का इंतजार कर रहे हैं ताकि चीन में उसकी सही स्थिति का पता लगाया जा सके।

यह प्रतिमा अब बुडापेस्ट में नैशनल म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री में रखी गई है और मई में लक्समबर्ग में एक अंतरराष्ट्रीय दौरे के लिए भेजी जायेगी।
प्राचीन बुद्ध की मूर्ति के अंदर मिला ममीकृत भिक्षु प्राचीन बुद्ध की मूर्ति के अंदर मिला ममीकृत भिक्षु Reviewed by on June 10, 2019 Rating: 5

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